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श्री उज्जैयिनी वैदिक कर्मकांड एवं ज्योतिष अनुसन्धान केंद्र

gauravज्योतिषशास्त्र के नियमानुसार राहू एवं केतु के मध्य सातों ग्रहों के एक ओर आ जाने से एक प्रकार का असंतुलन कुंड़ली में उपस्थित रहता है. जन्म कुंडली में राहू-केतु की नैऋत दिशा मानी गई है. जो कि पितरों के स्थान का प्रतिनिधित्व करती हैं. यही कारण है कि सिर्फ़ पितृ मोक्ष तीर्थ ही काल सर्प योग शान्ति के प्रमुख स्थान माने गये हैं.  भारत में ये चार स्थान उज्जैन, बद्रीनाथ, गया, नासिक |

स्कन्द पुराण के अवंतिका खण्ड़ के अनुसार सभी तीर्थों में सबसे अधिक महत्व उज्जैन नगरी का है. जहाँ विराजते हैं भूतनाथ भगवान राजाधिराज महाकाल. जो की पृथ्वी का नाभिस्थल है. विश्व प्रसिद्ध ज्योर्तिलिंग महाकालेश्वर है. काल की गणना का प्रमुख स्थल है. उज्जैन जहाँ है श्रीसिद्धवट तीर्थ, जिसे श्रीसिद्धवट तीर्थ स्थल कहा जाता है. जहाँ भगवान कार्तिक स्वामी ने तारकासुर का वध किया था एवम् उसे मोक्ष प्राप्त हुआ था. उज्जैन जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने महर्षि सांदीपानी आश्रम में विद्यार्थी के रुप में वेदों का अध्ययन किया था. रामघाट पर भगवान श्रीराम ने पिता का श्राद्ध किया.

तीर्थ की पवित्र भूमि देवताओं से ही नही, बल्कि युगों-युगों से लगने वाले समस्त महाकुम्भ में ऋषि मुनियों के चरणरज से भी पवित्र होती रही है. जहाँ पर मोक्ष प्रदायिनी क्षिप्रा नदी भारत की एकमात्र उत्तर वाहिनी नदी है और भारत ही नही विश्व में कही भी सनातन पूजन अनुष्ठान के संकल्प में जो संवत् का उच्चारण होता है वह भी उज्जैन के ही चक्रव्रती राजा विक्रमादित्य के नाम से विक्रम संवत् के नाम से जाना जाता है. अतः उज्जैन में पितृ शांति एवं काल सर्पयोग शांति अनुष्ठान कराने से सद्गति यानि मोक्ष, धन, सम्पत्ति, संतति अर्थात् वंश वृद्धि की प्राप्ति होती है.

काल सर्प दोष बहुत से ज्योतिषियों का चहेता बन गया है और हर तीसरे या चौथे व्यक्ति को ये बताया जा रहा है कि उसकी कुंडली में काल सर्प दोष है तथा उसकी सारी परेशानियों एवम समस्याओं का कारण यही दोष है। यह मत बिल्कुल भी ठीक नहीं है क्योंकि अगर कुंडली में सारा कुछ राहू और केतू ही तय कर देंगे तो बाकि के सात ग्रहों का तो कोई महत्त्व ही नहीं रह जाता। और इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले आईए एक नज़र में काल सर्प दोष की परिभाषा पर विचार कर लें।

सबसे पहले यह जान लें कि काल सर्प दोष और काल सर्प योग दोनों का एक ही मतलब है तथा इनमें कोई अंतर नहीं है। प्रचलित परिभाषा के अनुसार कुंडली के सारे ग्रह, सूर्य, चन्द्र, गुरू, शुक्र, मंगल, बुध तथा शनि जब राहू kaal-sarpऔर केतु के बीच में आ जाएं तो ऐसी कुंडली में काल सर्प दोष बनता है। उदाहरण के तौर पर अगर राहू और केतु किसी कुंडली में क्रमश: दूसरे और आठवें भाव में स्थित हों तथा बाकी के सात ग्रह दो से आठ के बीच या आठ से दो के बीच में स्थित हों तो प्रचलित परिभाषा के अनुसार ऐसी कुंडली में काल सर्प दोष बनता है और ऐसी कुंडली वाला व्यक्ति अपने जीवन काल में तरह-तरह की मुसीबतों का सामना करता है तथा उसके किए हुए अधिकतर प्रयासों का उसे कोई भी लाभ नहीं मिलता।

काल सर्प योग की स्थिति में जब राहू  और केतु के मध्य सारे ग्रह आ जाते है तब काल सर्प योग की स्थिति बनती है । शास्त्रों के अनुसार राहू के अधिदेवता काल और प्रत्यधि देवता सर्प है । अत : सर्पाकार आकृति में राहू को मुख और केतु को पूंछ माना जाता है । इस आधार पर इस योग को काल सर्प योग कहते है । यह योग शुभ है या अशुभ , इस का पता ग्रहों की आतंरिक स्थिति पर निर्भर करता है ।  इस योग के अशुभ होना पर यह व्यक्ति के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालता है । काल सर्प दोष में व्यक्ति का निसंतान होना या संतान का विलंभ से होना , कर्म के अनुसार फल न मिलना , मानसिक  चिंता , मुक़दमा , दुर्घटना , शारीरिक हीनता , जीवन से निराशा आदि  स्थितिया बन जाती है । इस दोष के निवारण हेतु काल सर्प कवच एवं यन्त्र का निर्माण किया गया है । एवं इसकी पूजा करवाना भी अनिवार्य होता है । इस यन्त्र एवं कवच के द्वारा व्यक्ति की सभी कठिनाइया दूर हो जाएँगी और उसके सभी कार्य सिद्ध होने लगेंगे ।

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